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Showing posts from August, 2017

विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य

" यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है। " विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा  !  विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति  लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है। विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है  ?  यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः  ' क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है  ? मछली को पानी की आवश्यकता है  ? ' जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का ...

कोई देख रहा है.......!

" ईश्वर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे हैं। आप उनके आगे भी कपड़ा रख दो ताकि आपको पाप का प्रायश्चित न करना पड़े। " एक मुसाफिर ने रोम देश में एक मुसलमान लुहार को देखा। वह लोहे को तपाकर लाल करके उसे हाथ में पकड़कर वस्तुएँ बना रहा था, फिर भी उसका हाथ जल नहीं रहा था। यह देखकर मुसाफिर ने पूछाः  " भैया  !  यह कैसा चमत्कार है कि तुम्हारा हाथ नहीं जल रहा। " लुहारः  " इस पानी (नश्वर) दुनिया में मैं एक स्त्री पर मोहित हो गया था और उसे पाने केक लिए सालों तक कोशिश करता रहा परंतु उसमें मुझे असफलता ही मिलती रही। एक दिन ऐसा हुआ कि जिस स्त्री पर मैं मोहित था उसके पति पर कोई मुसीबत आ गयी। उसने अपनी पत्नी से कहाः  " मुझे धन की अत्यधिक आवश्यकता है। यदि उसका बंदोबस्त न हो पाया तो मुझे मौत को गले लगाना पड़ेगा। अतः तुम भी कुछ करके, तुम्हारी पवित्रता बेचकर भी मुझे कुछ धन ला दो। '  ऐसी स्थिति में वह स्त्री, जिसको मैं पहले से ही चाहता था, मेरे पास आयी। उसे देखकर मैं बहुत ही खुश हो गया। सालों के बाद मेरी इच्छा पूर्ण हुई। मैं उसे एकांत में ले गया। मैंने उससे आने का कारण ...

संयम का फल

" तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं चौंकता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ। " गुजरात में भावनगर किला है। उस भावनगर का राजा भी जिससे काँपता था, ऐसा एक डाकू था जोगीदास खुमाण। एक रात्रि को वह अपनी एकांत जगह पर सोया था। चाँदनी रात थी। करीब 11 बजने को थे। इतने में एक सुंदरी सोलह श्रृंगार से सजी-धजी वहाँ आ पहुँची। जोगीदास चौंककर खड़ा हो गया। " खड़ी रहो। कौन हो  ? " वह युवती बाँहें पसारती हुई बोलीः  " तेरी वीरता पर मैं मुग्ध हूँ। अगर सदा के लिए नहीं तो केवल एक रात्रि  के लिए ही मुझे अपनी भुजाओं में ले ले। " गर्जता हुआ जोगीदास बोलाः  " वहीं खड़ी रह। तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं डरता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ। " युवतीः  " मैंने मन से तुम्हें अपना पति मान लिया है। " जोगीदासः  " तुमने चाहे जो माना हो, मैं किसी गुरु की परम्परा से चला हूँ। मैं अपना सत्यानाश नहीं कर सकता। तुम जहाँ से आयी हो, वहीं लौट जाओ। ' वह युवती पुनः नाज-नखरे करने लगी, तब जोगीदास बोल...

गृहस्थ जीवन की शोभा

" संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी  ' माँ '  के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ। " महात्मा गाँधी और उनकी पत्नी कस्तूरा का दाम्पत्य-प्रेम विषय-वासना से प्रेरित न होकर एक आदर्श, विशुद्ध, निष्कपट प्रेम का जाज्वल्यमान उदाहरण था। वैसे प्रारम्भ में गाँधी जी भी कामविकार के मोह से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी जीवनी में यह बात बड़ी सच्चाई से लिखी है कि अपने पिता की मृत्यु के समय भी वे अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर थे। ऐसी स्थिति थी लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कुछ आदर्श नियमों को स्थान दिया हुआ था। जैसे – नित्य सुबह शाम प्रार्थना करना, राम नाम का जप करना, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन  करना, हर सोमवार को मौन रखना आदि। जिससे उनका काम राम में बदला और निष्कामता का उनके जीवन में प्राकट्य हुआ। निष्कामता से क्षमताएँ विकसित होती है। गांधी जी एवं उनकी पत्नी कस्तूरबा एक दूसरे को केवल शरीर-भोग की वस्तु नहीं मानते थे, बल्कि आत्मिक प्रेम के साथ एक-दूसरे का पूरा सम्भव करते थे। एक बार महात्मा गाँधी एक सभा में शामिल होने के अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा के...

संकल्प और पुरुषार्थ

" उस चोट का निशान किंग कां के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ। " दरासोव (रूमानिया) मैं सन् 1909 में जन्मे एमाइल चजाया ( Emile  Czaja ) का आयु के अनुपात में शारीरिक विकास बहुत कम हो रहा था। वह दुबला-पतला और दब्बू प्रकृति का था। अक्सर अपने साथियों से मार खाकर घर आता था। यह सब उसके लिए असह्य था पर विवश था, पर क्या करता। एक दिन उसे बहुत बुरी तरह मार पड़ी। वह रोता-रोता घर आ रहा था कि उससे एक सज्जन ने पूछाः  " बच्चे  !  क्यों रोते हो  ? "  उसने उत्तर दियाः  " मैं दुबला हूँ, सब लड़के मुझे मारते हैं। " उस व्यक्ति ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपायी और प्राणबल भर दियाः "बेटे ! असम्भव कुछ नहीं है। तुम संयम, लगन व पुरुषार्थ का सहारा लो तो दुनिया को हिला सकते हो। फिर शरीर बल का विकास करना क्या बड़ी बात है। निराश मत होओ, उद्यम करो। तुम अवश्य सफल होओगे।" उन सज्जन के वचन बालक एमाइल के दिल में घर कर गये। एमाइल ने उनके बताये अनुसार दृढ़ संकल्प कर लिया। वह संयमी जीवन जीते हुए प्रबल पुरुषार्थ करने लगा। अपने लक्ष्य की...

सफलता का रहस्य

" फिल्म के अश्लील दृश्य या उपन्यासों के अश्लील वाक्य मनुष्य के मन को विचलित कर देते हैं और वह भोगों में जा गिरता है। " घटित घटना है – प्रसिद्ध गामा पहलवान, जिसका मूल नाम गुलाम हुसैन था, से पत्रकार जैका फ्रेड ने पूछाः  " आप एक हजार से भी ज्यादा कुश्तियाँ लड़ चुके हैं। कसम खाने के लिए भी लोग दो-पाँच कुश्तियाँ हार जाते हैं। आपने हजारों कुश्तियों में विजय पायी है और आज तक हारे नहीं हैं। आपकी इस विजय का रहस्य क्या है  ? " गुलाम हुसैन (गामा पहलवान) ने कहाः  " मैं किसी महिला की तरफ बुरी नजर से नहीं देखता हूँ। मैं जब कुश्ती में उतरता हूँ तो गीतानायक श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ और बल के लिए प्रार्थना करता हूँ। इसीलिए हजारों कुश्तियों में मैं एक भी कुश्ती हारा नहीं हूँ। यह संयम और श्रीकृष्ण के ध्यान की महिमा है। " ब्रह्मचर्य का पालन एवं भगवान का ध्यान.... इन दोनों ने गामा पहलवान को विश्वविजयी बना दिया। जिसके जीवन में संयम है, सदाचार हैं एवं ईश्वरप्रीति है वह प्रत्येक क्षेत्र में सफल होता ही है, इसमें संदेह नहीं है। युवानों को चाहिए कि गामा पहलवान के जीवन स...

भारत के सपूत

" भारत में कई ऐसे सपूत हो गये जो पहले साधारण थे लेकिन ध्यान, जप, प्राणायाम योगासन एवं दृढ़ संकल्प के माध्यम से दुनिया को चौंकाने वाले हो गये। " राममूर्ति नामक एक विद्यार्थी बहुत दुबला-पतला और दमें की बीमारी से ग्रस्त था। शरीर से इतना कमजोर था कि स्कूल जाते-जाते रास्ते में ही थक जाता और धरती पकड़कर बैठ जाता। जबकि राममूर्ति के पिता खूब मोटे-ताजे एवं तंदरुस्त थानेदार थे और वे राममूर्ति को भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व में देखना चाहते थे। किन्तु उसकी शारीरिक दुर्बलता देखकर वे खिन्न हो जाते थे। कई बार वे बोल पड़तेः " मेरा बेटा होकर तुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। इससे तो अच्छा होता तू मर जाता। " अपने पिता द्वारा बार-बार तिरस्कृत होने से राममूर्ति का मनोबल टूट जाता लेकिन ऐसे में उसकी माँ उसे सँभाल लेती थी। उसमें साहस भर देती थी। हर रोज उसे वीर पुरुषों की गाथाएँ सुनाया करती थी। महान योद्धाओं के चरित्र सुनकर राममूर्ति अपनी माँ से कहताः  " माँ  !  मैं भी वीर हनुमान, पराक्रमी भीम और अर्जुन जैसा कब बनूँगा  ? " राममूर्ति की जिज्ञासा देखकर माँ बहुत प्रसन्...

वास्तविक सौंदर्य

" दुर्गन्ध पैदा करने वाले इन खाद्यान्नों से बनी हुई चमड़ी पर आप इतने फिदा हो रहे हो तो.... " जैन धर्म में कुल 24 तीर्थांकर हो चुके हैं। उनमें एक राजकन्या भी तीर्थंकर हो गयी, जिसका नाम था मल्लियनाथ। राजकुमारी मल्लिका इतनी खूबसूरत थी कि कई राजकुमार व राजा उसके साथ ब्याह रचाना चाहते थे लेकिन वह किसी को पसंद नहीं करती थी आखिरकार उन राजकुमारों व राजाओं ने आपस में एकजुट मल्लिका के पिता को किसी युद्ध में हराकर उसका अपहरण करने की योजना बनायी। मल्लिका को इस बात का पता चल गया। उसने राजकुमारों व राजाओं को कहलवाया कि  ' आप लोग मुझ पर कुर्बान हैं तो मैं भी आप सब पर कुर्बान हूँ। तिथि निश्चित करिये। आप लोग आकर बातचीत करें। मैं आप सबको अपना सौंदर्य दे दूँगी। " इधर मल्लिका ने अपने जैसी ही एक सुन्दर मूर्ति बनवायी एवं निश्चित की गयी तिथि से दो-चार दिन पहले से वह अपना भोजन उसमें डाल देती थी। जिस महल में राजकुमारों व राजाओं को मुलाकात देनी थी, उसी में एक ओर वह मूर्ति रखवा दी गयी। निश्चित तिथि पर सारे राजा व राजकुमार आ गये। मूर्ति इतनी हूबहू थी कि उसकी ओर देखकर राजकुमार विचार ही क...

भोगों से वैराग्य

" इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ  !  इन गंदे अंगों के पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ  !" आंध्र प्रदेश में एक धनाढय सेठ का छोटा पुत्र वेमना माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने भैया और भाभी की छत्रछाया में पला-बढ़ा। उसकी भाभी लक्ष्मी उसे माँ से भी ज्यादा स्नेह करती थी। वह जितने रूपये माँगता उतने उसे भाभी से मिल जाया करते। बड़ा भाई तो व्यापार में व्यस्त रहने लगा और छोटा भाई वेमना खुशामदखोरों के साथ घूमने लगा। उनके साथ भटकते-भटकते एक दिन वह वेश्या के द्वार तक पहुँच गया। वेश्या ने भी देखा कि ग्राहक मालदार है। उसने वेमना को अपने मोहपाश में फँसा लिया और कुकर्म के रास्ते चल पड़ा। अभी वेमना की उम्र केवल 16-17 साल की ही थी। वेश्या जो-जो माँगें उसके आगे रखती, भाभी से पैसे लेकर वह उन्हें पूरी कर देता। एक बार उस वेश्या ने हीरे-मोतियों से जड़ा हार, चूड़ियाँ और अँगूठी माँगी। वेमना उस वेश्या के मोहपाश में पूरी तरह बँध चुका था। उसने रात को भाभी के गहने उतार लिये। भाभी ने देख के अनदेखा कर दिया। कुछ दिनों बाद वेमना ने भाभी का मँगलसूत्र उतारने की ...

आजादी की बुनियाद

"आजाद को धाक-धमकी और बेइज्जती के भय से अपना संयम-सत्त्व नाश कर देना किसी भी कीमत पर स्वीकार न था। " महान देशभक्त, क्रान्तिकारी वीर चन्द्रशेखर आजाद बड़े ही दृढ़प्रतिज्ञ थे। हर समय उनके गले में यज्ञोपवीत, जेब में गीता और साथ में पिस्तौल रहा करती थी। वे ईश्वरपरायण, बहादुर, संयमी और सदाचारी थे। एक बार व अपने एक मित्र के घर ठहरे हुए थे। उनकी नवयुवती कन्या ने उन्हें कामजाल में फँसाना चाहा। आजाद ने तुरंत डाँटकर कहाः  " इस बार तुम्हें क्षमा करता हूँ, भविष्य में ऐसा हुआ तो गोली से उड़ा दूँगा। " यह बात उन्होंने उसके पिता को भी बता दी और उनके यहाँ ठहरना बन्द कर दिया। सन् 1925 में काकोरी कांड की असफलता के बाद आजाद ने काकोरी छोड़ा एवं ब्रिटिश गुप्तचरों से बचते हुए झाँसी के पास एक छोटे से गाँव ठिमरपुरा पहुँच गये। कोई नहीं जानता था कि धोती एवं जनेऊ में सुसज्ज ये ब्राह्मण  ' आजाद '  हैं। गाँव के बाहर मिट्टी की दीवारों के भीतर आजाद रहने लगे। वे दिन भर गीता, महाभारत और रामायण के कथा-प्रवचन से ग्रामवासियों का दिल जीत लेते थे। धीरे-धीरे लोग उन्हें ब्रह्मचारी जी के नाम से ...

निर्भयता का रहस्य

" हाँ वह आता है, परंतु उसे मेरे मकान के बाहर ही खड़े रहना पड़ता है क्योंकि वह मुझे कभी खाली ही नहीं पाता। " स्वामी दयानंद का ब्रह्मचर्य बल बड़ा अदभुत था। वे शरीर से हृष्ट-पुष्ट, स्पष्टभाषी एवं निडर व्यक्तित्व के धनी थे। उनके संयम का ही प्रबल प्रभाव था कि विरोधियों ने उन्हें 22-22 बार जहर देने की कुचेष्टा की, किन्तु उनके शरीर ने उसे दूध-घी की तरह पचा दिया। एक बार अलीगढ़ में वे एक मुसलमान के यहाँ ठहरे हुए थे। अपना भोजन स्वयं बनाकर खाते एवं शाम को  ' कुराने शरीफ '  पर प्रवचन करते। वे कहतेः  " एक तरफ तो बोलते हो कि  ' ला इल्लाह इल्लिल्लाह... अल्लाह के सिवाय कोई नहीं है। सबमें अल्लाह है.... '  और दूसरी तरफ बोलते हो कि हिन्दुओं को मारो काटो... वे काफिर हैं...  ' ये कैसे नालायकी के विचार हैं  !'  क दिन गाँव के आगेवानों ने उनसे कहाः " स्वामी जी  !  आप एक मुसलमान के घर रहते हैं और मुसलमानों को खरी-खोटी सुनाते हैं। थोड़ा तो ख्याल करें  !' इस पर उन निर्भीक बाबा ने कहाः  " जिनके यहाँ रहता हूँ उनको अगर सत्य सुनाकर उन की गलती नहीं ...

संयमनिष्ठा

" जानती हो, हाड़ और मांस का नजदीक-से-नजदीक का रिश्ता माँ और बेटे का ही होता है। बस, आज से तुम मेरी माँ हुई और मैं तुम्हारा बेटा। " स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उन्होंने एक प्रयोग किया और बाद में निष्कर्षरूप में बताया कि जो विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में या परीक्षा से कुछ दिन पहले विषयों में फँस जाते हैं, वे परीक्षा में प्रायः असफल हो जाते हैं, चाहे वर्ष भर उन्होंने अपनी कक्षा में अच्छे अंक क्यों न पाये हों। जिन विद्यार्थियों का चित्त परीक्षा के दिनों में एकाग्र और शुद्ध रहा करता है, वे ही सफल होते हैं। स्वामी रामतीर्थ का जीवन भी संयम से पूर्ण था। एक बार जब रामतीर्थ अमेरिका में थे, तब मनोरीना नाम की एक धनाढ्य व सुन्दर युवती ने उनके आगे एक प्रस्ताव रखा। " मैं संसार भर में आपके नाम से कॉलेज, स्कूल, पुस्तकालय और अस्पताल खोलना चाहती हूँ। सारी दुनिया में आपके नाम कसे मिशन खुलवा दूँगी और प्रत्येक देश तथा नगर में आपके वेदान्त के प्रचार का सफल प्रबन्ध करवा दूँगी। " वास्तव में युवती का मकसद कुछ और ही था। इन सब बातों से वह स्वामी जी को प्रलोभन देने का प्रयास कर...

संयम की आवश्यकता

" सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। " जब स्वामी विवेकानन्दजी विदेश में थे, तब ब्रह्मचर्य की चर्चा छिड़ने पर उन्होंने कहाः  " कुछ दिन पहले एक भारतीय युवक मुझसे मिलने आया था। वह करीब दो वर्ष से अमेरिका में ही रहता है। वह युवक संयम का पालन बड़ी दृढ़तापूर्वक करता है। एक बार वह बीमार हो गया तो उसने डॉक्टर को बताया। तुम जानते हो डॉक्टर ने उस युवक को क्या सलाह दी  ?  कहाः  " ब्रह्मचर्य प्रकृति के नियम के विरूद्ध है। अतः ब्रह्मचर्य का पालन करना स्वास्थ्य के लिए हितकर नहीं है। " उस युवक को बचपन में ही ब्रह्मचर्य पालन के संस्कार मिले थे। डॉक्टर की ऐसी सलाह से वह उलझन में पड़ गया। वह मुझसे मिलने आया एवं सारी बातें बतायीं। मैंने उसे समझायाः तुम जिस देश के वासी हो वह भारत आज भी अध्यात्म के क्षेत्र में विश्वगुरू के पद पर आसीन है। अपने देश के ऋषि-मुनियों के उपदेश पर तुम्हें ज्यादा विश्वास है कि ब्रह्मचर्य को जरा भी न समझने वाले पाश्चात्य जगत के असंयमी डॉक्टर पर  ? ब्रह्मचर्य को प्रकृति के नियम के विरूद्ध कहने वालों को...

शाप बना वरदान

" जो अपने आदर्श से नहीं हटता, धैर्य और सहनशीलता को अपने चरित्र का भूषण बनाता है, उसके लिए शाप भी वरदान बन जाता है। " अर्जुन सशरीर इन्द्र-सभा में गया तो उसके स्वागत में उर्वशी, रम्भा आदि अप्सराओं ने नृत्य किये। अर्जुन के रूप सौंदर्य पर मोहित हो उर्वशी उसके निवास स्थान पर गयी और प्रणय निवेदन किया, साथ ही 'इसमें कोई दोष नहीं लगता' इसके पक्ष में अनेक दलीलें भी दीं, किंतु अर्जुन ने अपने दृढ़ इन्द्रिय-संयम का परिचय देते हुए कहाः यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघै। तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी।। गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि। त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया।। ' मेरी दृष्टि में कुंती, माद्री और शची का जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरु वंश की जननी होने के कारण आज मेरे लिए परम गुरुस्वरूप हो। हे वरवर्णिनि  !  मैं तुम्हारे चरणों में मस्तक रखकर तुम्हारी शरण में आया हूँ। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टि में तुम माता के समान पूजनीया हो और पुत्र के समान मानकर तुम्हें मेरी रक्षा करनी चाहिए। ' (महाभारत – वनपर्वणि इन्द...