भारत के सपूत

"भारत में कई ऐसे सपूत हो गये जो पहले साधारण थे लेकिन ध्यान, जप, प्राणायाम योगासन एवं दृढ़ संकल्प के माध्यम से दुनिया को चौंकाने वाले हो गये।"
राममूर्ति नामक एक विद्यार्थी बहुत दुबला-पतला और दमें की बीमारी से ग्रस्त था। शरीर से इतना कमजोर था कि स्कूल जाते-जाते रास्ते में ही थक जाता और धरती पकड़कर बैठ जाता। जबकि राममूर्ति के पिता खूब मोटे-ताजे एवं तंदरुस्त थानेदार थे और वे राममूर्ति को भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व में देखना चाहते थे। किन्तु उसकी शारीरिक दुर्बलता देखकर वे खिन्न हो जाते थे। कई बार वे बोल पड़तेः
"मेरा बेटा होकर तुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। इससे तो अच्छा होता तू मर जाता।"
अपने पिता द्वारा बार-बार तिरस्कृत होने से राममूर्ति का मनोबल टूट जाता लेकिन ऐसे में उसकी माँ उसे सँभाल लेती थी। उसमें साहस भर देती थी। हर रोज उसे वीर पुरुषों की गाथाएँ सुनाया करती थी। महान योद्धाओं के चरित्र सुनकर राममूर्ति अपनी माँ से कहताः "माँ ! मैं भी वीर हनुमान, पराक्रमी भीम और अर्जुन जैसा कब बनूँगा ?"
राममूर्ति की जिज्ञासा देखकर माँ बहुत प्रसन्न होती। माँ भारतीय संस्कृति का आदर करती थी। सत्संग में जाने से हमारे ऋषि-मुनियों के बताये हुए प्रयोगों की थोड़ी बहुत जानकारी उसे थी। उसने उन प्रयोगों को राममूर्ति पर आजमाना शुरु कर दिया। सुबह उठकर खुली हवा में दौड़ लगाना, सूर्य की किरणों में योगासन-प्राणायाम करना, दंड-बैठ लगाना, उबले अंजीर का प्रयोग करना.... इत्यादि से राममूर्ति का दमे का रोग तो मिट गया, साथ ही उसके फेफड़ों में प्राणशक्ति का इतना बल आ गया कि एक नाले में फँसी हुई भैंस को, जिसे गाँव के अन्य लोग नहीं निकाल पा रहे थे, राममूर्ति ने अपने बाहुबल से अकेले ही निकाल दिया। अब तो कहना ही क्या था। लोग राममूर्ति को पहलवान राममूर्ति के नाम से पहचानने लगे।
असम्भव कुछ भी नहीं है, सब सम्भव है। दमे की बीमारी से ग्रस्त राममूर्ति प्राणबल से पहलवान राममूर्ति बन गये। धीरे-धीरे उन्होंने अपने बल से ऐसे प्रयोग कर दिखाये कि भारत में ही नहीं, विदेश में भी उनकी प्रसिद्धि होने लगी। एक बार यूरोप का पहलवान युंजियन सेंडो भारत में आया। उसे घमंड था कि सारे यूरोप खंड में कोई भी उसे हरा नहीं सकता। राममूर्ति ने युंजियन सेंडो को संदेश भिजवाया कि वह उसके साथ कुश्ती करे। यह सुनकर युंजियन सेंडो को आश्चर्य हुआ कि मेरे साथ कुश्ती करने की किसकी हिम्मत हो गयी है। पर जब उसे खबर मिली की राममूर्ति 1200 रतल (करीब 552 किलो) वजन उठा लेता है, तब वह घबरा गया क्योंकि वह खुद 800 रतल(करीब 368 किलो) वजन ही उठा सकता था। उसने बहाना बनायाः "हम गोरे लोग हैं, हिन्दुस्तानी से हाथ नहीं मिलाते।"
उसके बाद राममूर्ति ने एक सर्कस निकाला, जिसमें 25-25 हार्स पावर की चालू जीपों को हाथों से पकड़े रखना, छाती पर पटिया रखकर उस पर हाथी को चलवाना ऐसे कई चमत्कार कर दिखाये। भारत में कई ऐसे सपूत हो गये जो पहले साधारण थे लेकिन जप, ध्यान, प्राणायाम, योगासन एवं दृढ़ संकल्प के माध्यम से दुनिया को चौंकाने वाले हो गये।

हे युवको ! तुम भी हिम्मत मत हारना, निराश मत होना। अगर कभी असफल भी हुए तो हताश मत होना वरन् पुनः प्रयास करना। तुम्हारे लिए असंभव कुछ भी नहीं होगा।

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