संकल्प और पुरुषार्थ

"उस चोट का निशान किंग कां के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ।"
दरासोव (रूमानिया) मैं सन् 1909 में जन्मे एमाइल चजाया (Emile Czaja) का आयु के अनुपात में शारीरिक विकास बहुत कम हो रहा था। वह दुबला-पतला और दब्बू प्रकृति का था। अक्सर अपने साथियों से मार खाकर घर आता था। यह सब उसके लिए असह्य था पर विवश था, पर क्या करता।
एक दिन उसे बहुत बुरी तरह मार पड़ी। वह रोता-रोता घर आ रहा था कि उससे एक सज्जन ने पूछाः "बच्चे ! क्यों रोते हो ?" उसने उत्तर दियाः "मैं दुबला हूँ, सब लड़के मुझे मारते हैं।" उस व्यक्ति ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपायी और प्राणबल भर दियाः "बेटे ! असम्भव कुछ नहीं है। तुम संयम, लगन व पुरुषार्थ का सहारा लो तो दुनिया को हिला सकते हो। फिर शरीर बल का विकास करना क्या बड़ी बात है। निराश मत होओ, उद्यम करो। तुम अवश्य सफल होओगे।"
उन सज्जन के वचन बालक एमाइल के दिल में घर कर गये। एमाइल ने उनके बताये अनुसार दृढ़ संकल्प कर लिया। वह संयमी जीवन जीते हुए प्रबल पुरुषार्थ करने लगा। अपने लक्ष्य की सिद्धि तक विवाह न करने की तथा संयम् ने दृढ़ रहने का उसने संकल्प ले लिया। अब वह प्रतिदिन खूब व्यायाम करके पौष्टिक आहार लेने लगा। कुछ ही समय में उसकी ऊँचाई 6 फीट 3 इंच और वजन 190 किलोग्राम हो गया। उसका विशाल, मजबूत और ऊँचा शरीर देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाने लगे।
किंग कांग ने अपना कुश्ती का पेशा भारत से ही आरम्भ किया। उसने किंगकांग नाम धारण कर दो हजार प्रथम श्रेणी की कुश्तियाँ लड़ीं और विश्वविख्यात पहलवान बना।
अपना पेशा आरम्भ करने के शुरूआती दौर में (लगभग 29 वर्ष की उम्र में) जब तक वह जर्मनी गया तो वहाँ उसके सुडौल शरीर पर अत्यधिक आसक्त हुई एक सुन्दरी ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे किंग कांग ने अस्वीकार कर दिया। इससे क्रोधोन्मत्त हुई उस सुन्दरी ने अपने निरादर का बदला किंग कांग पर शराब की बोतल फेंककर लिया। उस चोट का निशान किंग कांग के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ। लक्ष्य की पूर्ति तक अविवाहित रहने के अपने संकल्प में वह अडिग रहा।

संयम की शक्ति को आप चाहे जहाँ लगाओ, वह आपको वैश्विक सफलता प्रदान करेगी। उसका सहारा लेकर किंग कांग ने शरीर को सुदृढ़ बनाया और विश्वविख्यात पहलवान बना। आप भी अपनी संयम-शक्ति को जिस लक्ष्य की और लगायेंगे उसे अवश्य प्राप्त कर सकेंगे। अपने लक्ष्य पर ही अपना सारा ध्यान केन्द्रित करके पूरी निष्ठा व लगन से उद्यम करें तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है।

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