संयमनिष्ठा

"जानती हो, हाड़ और मांस का नजदीक-से-नजदीक का रिश्ता माँ और बेटे का ही होता है। बस, आज से तुम मेरी माँ हुई और मैं तुम्हारा बेटा।"
स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उन्होंने एक प्रयोग किया और बाद में निष्कर्षरूप में बताया कि जो विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में या परीक्षा से कुछ दिन पहले विषयों में फँस जाते हैं, वे परीक्षा में प्रायः असफल हो जाते हैं, चाहे वर्ष भर उन्होंने अपनी कक्षा में अच्छे अंक क्यों न पाये हों। जिन विद्यार्थियों का चित्त परीक्षा के दिनों में एकाग्र और शुद्ध रहा करता है, वे ही सफल होते हैं।
स्वामी रामतीर्थ का जीवन भी संयम से पूर्ण था। एक बार जब रामतीर्थ अमेरिका में थे, तब मनोरीना नाम की एक धनाढ्य व सुन्दर युवती ने उनके आगे एक प्रस्ताव रखा।
"मैं संसार भर में आपके नाम से कॉलेज, स्कूल, पुस्तकालय और अस्पताल खोलना चाहती हूँ। सारी दुनिया में आपके नाम कसे मिशन खुलवा दूँगी और प्रत्येक देश तथा नगर में आपके वेदान्त के प्रचार का सफल प्रबन्ध करवा दूँगी।"
वास्तव में युवती का मकसद कुछ और ही था। इन सब बातों से वह स्वामी जी को प्रलोभन देने का प्रयास कर रही थी किंतु रामतीर्थ भी अपनी निष्ठा में अटल थे। उन्होंने भी सहजतापूर्वक उत्तर दियाः दुनिया में जितने भी धार्मिक मिशन है, वे सब राम के ही हैं। राम अपने नाम से कोई अलग मिशन चलाना नहीं चाहता, क्योंकि राम कोई नयी बात तो कहता नहीं। राम जो कुछ कहता है, वह शाश्वत सत्य है।"
परंतु उस युवती ने जब बार-बार वही बात दोहरायी, तब स्वामी जी ने पूछाः "आखिर आप चाहती क्या हैं ?" इस सीधे प्रश्न पर उसने कहा कि "मैं केवल अपना मिसेज राम लिखना चाहती हूँ। मैं आपके नजदीक-से-नजदीक रहकर आपकी सेवा करना चाहती हूँ।" इस प्रकार जब वह युवती बार-बार नजदीकी रिश्ते की बात करने लगी तो रामतीर्थ ने भी कह दियाः
"जानती हो, हाड़ और मांस का नजदीक-से-नजदीक का रिश्ता माँ और बेटे का ही होता है। बस, आज से तुम मेरी माँ हुई और मैं तुम्हारा बेटा।"

युवावस्था के प्रारम्भ में स्वामी रामतीर्थ अत्यंत क्षीणकाय और दुर्बल थे। उनका स्वास्थ्य इतना चौपट था कि उसके सुधरने की कोई आशा नहीं की जा सकती थी। किन्तु केवल अपने दृढ़ संकल्प और संयम के बल पर उन्होंने अपने शरीर कोक पुष्ट और स्वस्थ बना लिया था। एक बार अमेरिका में उन्होंने शास्ता पर्वत की चोटी पर चढ़ने की प्रतियोगिता में भाग लिया, जिसकी ऊँचाई समुद्र-तल से 14,171 फुट है। इस प्रतियोगिता में राम को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। एक बार वे 'मैराथन रेस' भी दौड़े थे पूरे 26 मील (42 कि.मी.) की। उस दौड़ में भी उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। सफलता की नींव है संयमनिष्ठा। स्वामी रामतीर्थ की संयमनिष्ठा ने उन्हें लौकिक सफलताएँ तो क्या, परम सफलता 'आत्मसाक्षात्कार' की भी प्राप्ति करायी थी।

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