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विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य

" यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है। " विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा  !  विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति  लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है। विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है  ?  यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः  ' क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है  ? मछली को पानी की आवश्यकता है  ? ' जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का ...

कोई देख रहा है.......!

" ईश्वर हमारे प्रत्येक कार्य को देख रहे हैं। आप उनके आगे भी कपड़ा रख दो ताकि आपको पाप का प्रायश्चित न करना पड़े। " एक मुसाफिर ने रोम देश में एक मुसलमान लुहार को देखा। वह लोहे को तपाकर लाल करके उसे हाथ में पकड़कर वस्तुएँ बना रहा था, फिर भी उसका हाथ जल नहीं रहा था। यह देखकर मुसाफिर ने पूछाः  " भैया  !  यह कैसा चमत्कार है कि तुम्हारा हाथ नहीं जल रहा। " लुहारः  " इस पानी (नश्वर) दुनिया में मैं एक स्त्री पर मोहित हो गया था और उसे पाने केक लिए सालों तक कोशिश करता रहा परंतु उसमें मुझे असफलता ही मिलती रही। एक दिन ऐसा हुआ कि जिस स्त्री पर मैं मोहित था उसके पति पर कोई मुसीबत आ गयी। उसने अपनी पत्नी से कहाः  " मुझे धन की अत्यधिक आवश्यकता है। यदि उसका बंदोबस्त न हो पाया तो मुझे मौत को गले लगाना पड़ेगा। अतः तुम भी कुछ करके, तुम्हारी पवित्रता बेचकर भी मुझे कुछ धन ला दो। '  ऐसी स्थिति में वह स्त्री, जिसको मैं पहले से ही चाहता था, मेरे पास आयी। उसे देखकर मैं बहुत ही खुश हो गया। सालों के बाद मेरी इच्छा पूर्ण हुई। मैं उसे एकांत में ले गया। मैंने उससे आने का कारण ...

संयम का फल

" तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं चौंकता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ। " गुजरात में भावनगर किला है। उस भावनगर का राजा भी जिससे काँपता था, ऐसा एक डाकू था जोगीदास खुमाण। एक रात्रि को वह अपनी एकांत जगह पर सोया था। चाँदनी रात थी। करीब 11 बजने को थे। इतने में एक सुंदरी सोलह श्रृंगार से सजी-धजी वहाँ आ पहुँची। जोगीदास चौंककर खड़ा हो गया। " खड़ी रहो। कौन हो  ? " वह युवती बाँहें पसारती हुई बोलीः  " तेरी वीरता पर मैं मुग्ध हूँ। अगर सदा के लिए नहीं तो केवल एक रात्रि  के लिए ही मुझे अपनी भुजाओं में ले ले। " गर्जता हुआ जोगीदास बोलाः  " वहीं खड़ी रह। तू स्त्री है, यह मैं जानता हूँ। लेकिन मैं शत्रुओं से इतना नहीं डरता हूँ, जितना विकारों से चौंकता हूँ। " युवतीः  " मैंने मन से तुम्हें अपना पति मान लिया है। " जोगीदासः  " तुमने चाहे जो माना हो, मैं किसी गुरु की परम्परा से चला हूँ। मैं अपना सत्यानाश नहीं कर सकता। तुम जहाँ से आयी हो, वहीं लौट जाओ। ' वह युवती पुनः नाज-नखरे करने लगी, तब जोगीदास बोल...

गृहस्थ जीवन की शोभा

" संयोजक ने भूल से एक सच्ची बात कह दी। सचमुच, कस्तूरबा हमारी  ' माँ '  के समान ही हैं। मैं इनको आदर देता हूँ। " महात्मा गाँधी और उनकी पत्नी कस्तूरा का दाम्पत्य-प्रेम विषय-वासना से प्रेरित न होकर एक आदर्श, विशुद्ध, निष्कपट प्रेम का जाज्वल्यमान उदाहरण था। वैसे प्रारम्भ में गाँधी जी भी कामविकार के मोह से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी जीवनी में यह बात बड़ी सच्चाई से लिखी है कि अपने पिता की मृत्यु के समय भी वे अपनी पत्नी के साथ बिस्तर पर थे। ऐसी स्थिति थी लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कुछ आदर्श नियमों को स्थान दिया हुआ था। जैसे – नित्य सुबह शाम प्रार्थना करना, राम नाम का जप करना, श्रीमद् भगवद् गीता का अध्ययन  करना, हर सोमवार को मौन रखना आदि। जिससे उनका काम राम में बदला और निष्कामता का उनके जीवन में प्राकट्य हुआ। निष्कामता से क्षमताएँ विकसित होती है। गांधी जी एवं उनकी पत्नी कस्तूरबा एक दूसरे को केवल शरीर-भोग की वस्तु नहीं मानते थे, बल्कि आत्मिक प्रेम के साथ एक-दूसरे का पूरा सम्भव करते थे। एक बार महात्मा गाँधी एक सभा में शामिल होने के अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा के...

संकल्प और पुरुषार्थ

" उस चोट का निशान किंग कां के लिए संयम में दृढ़ रहने के अपने संकल्प की याद दिलाने वाला प्रेरक चिह्न साबित हुआ। " दरासोव (रूमानिया) मैं सन् 1909 में जन्मे एमाइल चजाया ( Emile  Czaja ) का आयु के अनुपात में शारीरिक विकास बहुत कम हो रहा था। वह दुबला-पतला और दब्बू प्रकृति का था। अक्सर अपने साथियों से मार खाकर घर आता था। यह सब उसके लिए असह्य था पर विवश था, पर क्या करता। एक दिन उसे बहुत बुरी तरह मार पड़ी। वह रोता-रोता घर आ रहा था कि उससे एक सज्जन ने पूछाः  " बच्चे  !  क्यों रोते हो  ? "  उसने उत्तर दियाः  " मैं दुबला हूँ, सब लड़के मुझे मारते हैं। " उस व्यक्ति ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपायी और प्राणबल भर दियाः "बेटे ! असम्भव कुछ नहीं है। तुम संयम, लगन व पुरुषार्थ का सहारा लो तो दुनिया को हिला सकते हो। फिर शरीर बल का विकास करना क्या बड़ी बात है। निराश मत होओ, उद्यम करो। तुम अवश्य सफल होओगे।" उन सज्जन के वचन बालक एमाइल के दिल में घर कर गये। एमाइल ने उनके बताये अनुसार दृढ़ संकल्प कर लिया। वह संयमी जीवन जीते हुए प्रबल पुरुषार्थ करने लगा। अपने लक्ष्य की...

सफलता का रहस्य

" फिल्म के अश्लील दृश्य या उपन्यासों के अश्लील वाक्य मनुष्य के मन को विचलित कर देते हैं और वह भोगों में जा गिरता है। " घटित घटना है – प्रसिद्ध गामा पहलवान, जिसका मूल नाम गुलाम हुसैन था, से पत्रकार जैका फ्रेड ने पूछाः  " आप एक हजार से भी ज्यादा कुश्तियाँ लड़ चुके हैं। कसम खाने के लिए भी लोग दो-पाँच कुश्तियाँ हार जाते हैं। आपने हजारों कुश्तियों में विजय पायी है और आज तक हारे नहीं हैं। आपकी इस विजय का रहस्य क्या है  ? " गुलाम हुसैन (गामा पहलवान) ने कहाः  " मैं किसी महिला की तरफ बुरी नजर से नहीं देखता हूँ। मैं जब कुश्ती में उतरता हूँ तो गीतानायक श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ और बल के लिए प्रार्थना करता हूँ। इसीलिए हजारों कुश्तियों में मैं एक भी कुश्ती हारा नहीं हूँ। यह संयम और श्रीकृष्ण के ध्यान की महिमा है। " ब्रह्मचर्य का पालन एवं भगवान का ध्यान.... इन दोनों ने गामा पहलवान को विश्वविजयी बना दिया। जिसके जीवन में संयम है, सदाचार हैं एवं ईश्वरप्रीति है वह प्रत्येक क्षेत्र में सफल होता ही है, इसमें संदेह नहीं है। युवानों को चाहिए कि गामा पहलवान के जीवन स...

भारत के सपूत

" भारत में कई ऐसे सपूत हो गये जो पहले साधारण थे लेकिन ध्यान, जप, प्राणायाम योगासन एवं दृढ़ संकल्प के माध्यम से दुनिया को चौंकाने वाले हो गये। " राममूर्ति नामक एक विद्यार्थी बहुत दुबला-पतला और दमें की बीमारी से ग्रस्त था। शरीर से इतना कमजोर था कि स्कूल जाते-जाते रास्ते में ही थक जाता और धरती पकड़कर बैठ जाता। जबकि राममूर्ति के पिता खूब मोटे-ताजे एवं तंदरुस्त थानेदार थे और वे राममूर्ति को भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व में देखना चाहते थे। किन्तु उसकी शारीरिक दुर्बलता देखकर वे खिन्न हो जाते थे। कई बार वे बोल पड़तेः " मेरा बेटा होकर तुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। इससे तो अच्छा होता तू मर जाता। " अपने पिता द्वारा बार-बार तिरस्कृत होने से राममूर्ति का मनोबल टूट जाता लेकिन ऐसे में उसकी माँ उसे सँभाल लेती थी। उसमें साहस भर देती थी। हर रोज उसे वीर पुरुषों की गाथाएँ सुनाया करती थी। महान योद्धाओं के चरित्र सुनकर राममूर्ति अपनी माँ से कहताः  " माँ  !  मैं भी वीर हनुमान, पराक्रमी भीम और अर्जुन जैसा कब बनूँगा  ? " राममूर्ति की जिज्ञासा देखकर माँ बहुत प्रसन्...